गढ़वाळ का बारा मा जाणा

 


परिचै 

 

 

गढ़वाळ मण्डल

उत्तराखण्ड को नक्सा

गढवाळ मण्डल, जैमा देहरादून, हरिद्वार, टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पौड़ी गढ़वाळ जिला औन्दिन। पर इख भि भौत सी बोलियां छिन, जौं को बात करण को तरिका भि अलग-अलग च। मगर जब्ब लोग पौड़ी जिला का ‘श्रीनगर’ नगर की गढ़वळी तैं सूणदन ज्‍वा की ‘श्रीनगरिया’ बोलि का नौ से जणै जान्दी। अर या एक इन्दरि बोलि च, ज्‍वा की सब्ब लोगु का सूनण मा अच्‍छी अर ऊँका बिंगण मा भि अच्‍छे से औन्दी।

अर उत्तराखण्ड तैं देवभूमि” अर “तपोभूमि” का नौ से जणै जान्दु। अर या दिखण मा भौत सुन्दर जगा च, भौत साल पैलि इख यक्छ, किन्‍नर, गन्थर्व रौन्दा छा, जौं कू राजा धन को देवता “कुबेर” मणै जान्दु । अर ये कुबेर की राजधानी अलकापुरी बतये जान्दी, जु की बद्रीनाथ का मथि च। येका नजदिक हिमालै च, जैका बारा मा इन लिखे गै, कि येमा पाँच खण्ड छिन। याने की नेपाल, कुमाऊँ, हिमाचल परदेस, कशमीर अर केदारखण्ड अर यू मानस खण्ड का नौ से लिख्युं च।

 

 

 

 

 

 


 

गढ़वाळ नौ कनकै पोडी जाणा 

 

 

हमरु उत्तराखण्ड हिमालै का पाँच भागों मा हरिद्वार बटि लेके कैलाश पाड़ तक फैलयुं च। गढ़वाल नौ होण से पैलि ईं जगा को नौ केदारखण्डछौ, अर इन मणै कनकैजान्दु, कि सोलवीं सदी का शुरु मा राजा अजयपाल न छुटा-छुटा गढ़ो तैं इकट्‍ठा कैरी छौ। अर यों ही गढ़ों की वजै से  येको नौ ‘गढ़वाळ’ पोड़ी, अर रायबहादुर पातीराम का अनुसार ‘गढ़वाळ’ से ये मुलक को नौ गढवाल पौड़ी, अर इन्‍नि भौत सा कारण छिन ज्यां की वजै से येको नौ ‘गढ़वाळ’ पौड़ी। पुरणा बगत मा इख बस्यां अलग-अलग जाति का लोगु न अपणा गौं अर गढ़ का नौ पर जन कि ‘वाल’ अर ‘याल’ लगै के अपणी उपजाति रखदा छाँ, इलै एक कारण यू भि मणै जान्दु। अर इन भि मणै जान्दु कि अजयपाल न ‘बावन मुख्या गढ़ों पर जीत पै’ के अपणा राज तैं फैलै छौ। अर येका दगड़ा-दगड़ी और भि भौत सी वजै छिन।

 

 

 


 

 

लड़ै को बगत

 

8 सितम्बर सन् 1803 ई. सन् मा गढ़वाळ मा एक भैंकर भ्युंचळु एक छौ। तब्ब भौत सरा लोगु को नास ह्‍वे छौ अर इख तक की श्रीनगर नगर भि पूरो नास ह्‍वे गै छौ। राजा का रजवाडा भि रौण लैक नि रयुं छौ, अर ये भ्युंचळा का झटका काफी दिनों तक औण रैनी, अर काफी गौं भि खतमलड़ै की तकवार ह्‍वे गै छा। ज्‍यां की वजै से एक खतरनाक अकाल पौड़ी गै, अर यों दिनों मा प्रद्धम्नशाह (1797-1804 ई. सन्) राजा छौ। अर अभि यू अकाल पौड़ी ही छौ, कि ऊं दिनों मा ही नेपाल की राजनीति गोरखाणी रानी का हाथों मा छै। अर कुमाऊँ गढ़वाल त 1790 ई. सन् बटि गोरखो का कबजा मा छौ। अर गढवाळ पर लडै करण को यू बगत यों तैं भौत अच्‍छु लगि त ऊंन फरबरी 1803  ई. सन् मा गोरखा सेना अमरसिंह थापा अर हस्तीदल चौतरिया का सेना की देख-रेख मा गढ़वाळ पर अपणी लडै छैड़ी दिनी। अर राजा प्रद्धम्नशाह तैं श्रीनग छोड़ी के भगड़ पोड़ी, मगर फिर भि राजा न अपणी हिम्मत नि हारी, अर 14 मई 1804 का दिन पर राजा प्रद्धम्नशाह देहरादून का खुड़बुड़ा नौ की जगा मा गोरखा बटि लडै का बगत ऊँका हाथों बटि मरै गै। अर इन कैरिके गोरखों न पूरा गढ़वाल मा अपणु राज कैरी। अर काफी बगत तक यों न राज कैरी, मगर कुछ और राजा ऊँका खिलाप मा छा। मगर यों का पास मा इथगा सेना नि छै कि यू लडै कैरी सैका, इलै यों न अंगरेजों बटि मदद माँगी, बदला मा पैसा देण को वादा कैरी।  अर ऊंन गोरखो तैं लड़ै मा हरै के गढवाळ बटि वापिस जाण पर मजबूर कैरी दिनी। मगर जब्ब गोरखा चलि गैनी त वादा का अनुसार पैसा तैं देणे की यों हिम्मत नि ह्‍वे, किलैकि यों मा पैसा नि छा, इलै अंगरेजों न येका बदला मा गढ़वाळ का दूसरा हिस्सा याने की टिहरी गढ़वाळ तैं ईस्ट इंण्डिया कम्पनी तैं दे दिनी।

1856 से लेके 1884 तक को यू बगत ब्रिटिश काल को सब्ब से अच्छु बगत मणै गै, ये बगत उत्तराखण्ड की देख-रेख हैनरी रैमजै का हाथों मा छै। 

 

 

 


 

आंदोलन

 

गोरखा शासन का खतम होण का बाद जब्ब गढ़वाळ मा अंगरेजी शासन चलण लगि गै अर ये बगत सुदर्शनशाह को टिहरी गढ़वाळ को रजवाड सम्भळ्यु छौ। अर ये बगत कै का मन मा भि अंगरेजों का खिलाप कुई बुरी इच्छा नि छै, अर गोरखों बटि आजादी मिलण का बाद यो न अंगरेजों तैं एक मोक्षदाता समझी। यूई कारण छौ, कि गढ़वाळ मा आजादी को यू आंदोलन बीसवी सदी मा शुरु ह्‍वे।

                        सन् 1919 मा बैरिस्टर मुकंदीलाल न अनुसूया प्रसाद बहुगुणा का दगड़ा मिली के गढ़वाल मा राष्टीय कांग्रेस की नीब डाली। तब्ब वे बगत पर मथुरा प्रसाद नैथानी, भोलादत्त चंदोला,भोलादत्त डबराल और भौत सा लोगु न सत्याग्रह आंदोलन मा बड़ी तेजि से भाग लै। अर 1929 तक गढ़वाल मा भि ये आंदोलन की आग जगि गै छै,

                        23 अप्रैल 1930 कू जाणा-माणा वीर चन्द्रसिंह गढ़वाळि न निहत्था लोगु वीर चन्द्र सिंह गढ़वाळीपर गोली मरण से इतिहास ही रचि दिनी, अर आजाद हिन्द फौज मा ढाई हजार (कुल फौज का दसु परतिसत) सिपै छा। अर 9 जून 1930 कू पौड़ी मा कुमाऊँ परिषद की एक सभा ह्‍वे, जैमा सत्याग्रह समिति बणयै गै, जैका अध्यक्स जीवानंद डोभाल, भौलादत्त चंदोला मंत्री अर प्रताप नेगी संचालक नियुक्‍त किये गैनी। अए ये ही साल मा दुगड्‍डा मा एक सभा रखे गै छै, जैमा पंडित जवाहरलाल नेहरु न भि भाग ले छौ। 

 

 

                         टिहरी बटि भारत छोड़ा आंदोलन की शुरुवात ह्‍वे छै। 1944 मा श्रीदेव सुमन न राजशाही का खिलाप ऐतिहासिक भूख हड़ताल शुरु कैरी, अर या चौरासी दिनों भूख हड़ताल छै। ईं आजादी का दौरन 11 जनबरी सुमन जी1948 मा नरेन्द्र नगर मा नागेन्द्र सकलानी अर मोलू भरदारी शहीद ह्‍वे गै छा इन कैरिके यों लोकतंत्र की शुरुवात कैरी दिनी।

 

 

 


 

 

आजादी का बाद

 

भारत आजाद होण का बाद उत्तर परदेस राज्य मा 24 फरबरी 1960 कू जिला का गठन ह्‍वे। चमोली अर उत्तरकाशी तहसीलों तैं बड़ु मणै गै, मगर उत्तर परदेस  शासन न सन् 1968 मा फिर से पाड़ी जनपदों तैं 1969 मा गढ़वाल अर कुमाऊँ बटि अलग कैरिके बणै। अर सन् 1997 का बगत मा चमोली मुख्या जनपद यू छा मतलब ऊखीमठ अर अगस्त्यमुनी विकास खण्ड, टिहरी जिले की जखोली उप तहसील, पौड़ी मा खिर्सू का कुछ गौं

आजादी

की सभाओं तैं चुणयुं छौ। अर चमोली मा कर्णप्रयाग अर पोखरी विकास खण्ड की एक अर दुई न्याय पंचायतों तैं मिलै कै रुद्रप्रयाग जनपद को निर्माण कैरी छौ।

पर आज का बगत मा गढ़वाळ का चमोली, पौड़ी, रुद्रप्रयाग, टिहरी, उत्तरकाशी, हरिद्वार, देहरादून जनपद छिन।

 

 

 

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