पुरणु प्रथना घौर को इतिहास

गढ़वाल मा ईसाई लोगु को इतिहास

उत्तराखंड का गढ़वाल मा ईसाई धर्म को इतिहास मुख्य रूप से ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन (1815 का बाद) बटि जुड़यूं च, जैमा मिशनरियों न पश्चिमी शिक्षा अर स्वास्थ्य सेवा की शुरुआत कैरि, विशेष रूप से पौड़ी अर गौं मा स्कूल सुरु कैरिन, अर वेका द्वारा विकास ह्वे अर बाद मा उत्तराखंड आंदोलन जन   जाणामाणा आंदोलनों तैं अगनै बडै, हालांकि भारत देस मा ईसाई धर्म की सुरुवात संत थॉमस बटि ह्वे छै।

रुवाती परिचय 
भारत मा ईसाई धर्म की सुरुबात संत थॉमस (पहली शताब्दी) का बगत बटि ह्वे छै, मगर ब्रिटिश काल से पैली गढ़वाल मा कुई अलग ढंग से, या बड़ा आधार पर ईसाई लोगु का बारा मा कुई पर्याप्त दस्तावेजी जानकारी नि च।


ब्रिटिश युग (1815 का बाद)
जै बगत भारत पर राज छौ:एंग्लो-नेपाली युद्ध (1816) का बाद , गढ़वाल ब्रिटिश शासन का अधीन ह्वे गै, जैमा पौड़ी जन पहाडी पर्यटन जगा ब्रिटिशों की सरकारी जगा अर केंद्र बण गैनि।
मिशनरी लोगु का काम: कुछ ब्रिटिश अर अमेरिकी मिशनरी ऐनी अर ऊन, मुखिया रुप से 1900 की सुरुवात मा अपणी जगा बनै दिनी।
शिक्षा अर  आधुनिकीकरण: मिशनरियों न पश्चिमी शिक्षा की शुरुआत कैरी, जन पौड़ी मा स्कूलों तैं देखी जै सकदू च, अर येका द्वारा भौत वृद्धि ह्वे अर वे क्षेत्र मा आधुनिक सोच अर सुरुवाती नींव रखे गै।
समुदाय का लोगु को विकास: ये बगत मा एक ईसाई समुदाय को विकास ह्वे, दरसल मा ऊं मिस्नरियों को एक गोरा होण का कारण लोगु को ऊं बटि जुडण को काम बडू कठीन छौ।

भारत का आजाद ह्वे जाण अर वेका बाद को बगत 
सांस्कृति को प्रभाव: मिशनरियों द्वारा दियां शिक्षा का ढांचा न गढ़वाल की उच्च साक्षरता दर मा भौत बडू योगदान देई औ अर क्षेत् की पहचान तैं भि प्रभावित कैरी।
आज तक ऊको प्रभाव: उत्तराखंड मा ईसाई धर्म की उपस्थिति आज तक बरकरार च, अर राजपूत गढ़वालीयों जन समूदाए का लोगु मा आध्यात्मिक नवीनीकरण खुणी निरंतर प्रयास जारी च। 
प्रमुख कारिया
पूरी जानकारी खुणी, "उत्तराखंड का ईसाई इतिहास, खंड 1" मिशनरी लोगु का काम अर ऊंका प्रभाव को पैलु व्यवस्थित इतिहास बतौन्दू च।
"कुमाऊं अर गढ़वाल मा 1815 बटि 1947 तक ईसाई धर्म को विस्तार अर प्रभाव" पर कियूं अध्यन ऐतिहासिक गहराई का बारा मा बतौन्दू च। 

पुरणु प्रथना घौर को इतिहास

इतिहास

सदियों बटि गढ़वाल हिमाल मा मनखियों को रौंण उन्नी च जन भारती उपमहाद्वीप मा लोग रौंणा छिन। कत्युरी राजबंस गढ़वाल को पैलु राजवंश छौ, अर ऊन उत्तराखंड मा राज कैरी अर वेकु इतिहास इन पता लगदु किलैकी आज भि ऊंका द्वारा बणया मन्दिर अर शिलालेख छिन। अर कत्युरी राज वंश का पतन का बाद इन मने जांदू कि गढ़वाल चौंसठ रियासतों से जादा भागो मा बटि गै, अर उख अलग-अलग मुखिया राज करण लगि गैनि। अर यों रियास्तों मा एक खास रियासत छै जीं को नौं चांदपुरगढ़ छौ, अर ईं रियासत पर कनकपाल का वंशजों को राज छौ।

15वीं सदी का बीच मा, कनकपाल का वंशज जगतपाल (1455 स्यूं 1493 ई.) का बगत मा चांदपुरगढ़ एक शक्तिशाली रियासत बणि गै। 15वीं सदी का आखिरी तक अजयपाल चांदपुरगढ़ का सिंहासन पर बैठी गै अर वेन गढ़वाल इलाका की अलग-अलग रियासतों तैं मिलै के एक राज्य का रूप मा जोड़ दिनी। अर तब बटि ही ये इलाका को नौ गढ़वाल पड़ि गै।अर येका बाद वेन 1506 से पैली अपणी राजधानी चांदपुर बटि देवलगढ़ और बाद मा 1506 अर 1519 का बीच श्रीनगर मा कैर दिनी।


अर वेका बाद अजयपाल अर वेका बाद आण वला लोगु न तीन सौ सालों तक गढ़वाल पर राज कैरी, अर ये बगत ऊतैं कुमाऊ, मुगलों सिखों अर रोहिल्लाओं को हमला झिलण पोड़ी।  अर गढ़वाल का इतिहास मा सबसे खतरनाक हमला गोरखा लोगु को छौ, अर यु लोग अपणा खतनाक हमला खुणी ही जने जान्दा छा, अर  'गोरख्यानी' शब्द लूटपाट करण वली सैना को दुसरू नौ बण गै। डोटी अर कुमाऊं पर कब्ज़ा करण का बाद, गोरखाओं न गढ़वाल पर हमला कैर दिनी अर गढ़वाली सिपयों का द्वारा रुकण का बाद भि वु लोग लंगूरगढ़ तक पौंछि गैनि। मगर जब चीनी लोगु का द्वारा हमला की खबर ऐ, त ऊं गोरखा सिपयों तैं घेरा हटाण पोड़ी अर 1803 मा ऊं न फिर हमला कैरी।

अर कुमाऊं पर जीत हासिल करण का बाद, ऊन तीनभागों मा गढ़वाल पर हमला कैरी। अर पांच हज़ार गढ़वाली सिपै ऊंका हमलों को सामना नि कैर सकिन, इलै राजा प्रद्युम्न शाह अपणी जान बचाणु खुणी देहरादून भाग गै। खुरबुरा की लड़ाई मा  गढ़वाली सिपयों को भारी नुकसान ह्वे, अर राजा खुद भि मारी गै। अर वेका बाद 1804 मा, गोरखा पूरा गढ़वाल इलाके का मालिक बण गैनि अर ऊन बारह सालों तक राज कैरी।

 

अर अंग्रेजों न गोरखा लोगु तैं गढ़वाल बटि खदेड़ी के काली नदी का दुसरा पार भगै दिनी अर इनके 1815 मा गोरखा लोगु को राज खत्म ह्वे गै। अर गोरखा लोगु कि हार का बाद 21 अप्रेल 1815 मा अग्रेजों न अलकनंदा अर भागीरथी नदियों का पूर्व दिशा कि तरफा गढ़वाल का इलाका का पूरब इलाका तैं अपणु बनै दिनी, अर वेका बाद 'ब्रिटिश गढ़वाल' अर देहरादून दून बुले जाण लगि गै। अर गढ़वाल को बचयु दुसरू हिस्सा जु पश्चिम दिशा कि तरफा छौ, वु राजा सुदर्शन शाह तैं वापस दे दिये गै, अर वेन टिहरी मा अपणी राजधानी बनै दिनी। अर सुरुवात मा सरकारी विभाग कुमाऊं अर गढ़वाल का कमिश्नर तैं सौंपे गै, अर हेडक्वार्टर नैनीताल मा छौ। मगर 1840 मा गढ़वाल तैं अलग कैरिके एक जिला का रूप मा बनै दिनी, अर फिर दुसरा कमिश्नर को हेडक्वार्टर पौड़ी मा बण गै।
 

प्रार्थना घौर
पुरणु प्रथना घौर

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