इतिहास
प्राचीन
गढ़वाल को इतिहास
गढ़वाल का राज बंस कि सुरुवात कनक पाल बटि ही ह्वे छै, अर गढ़वाल को सम्राज्या की सुरुवात लगभल 823 मा ह्वे छै, जै बगत मालवा याने कि आज का बगत मा मध्या परदेस को राज कुमार बद्रीनाथ मन्दिर की यात्रा पर ग्यु छौ, अर जब वू ईं यात्रा पर त छा त ऊकी मुलाक़ात भानु प्रताप बटि ह्वे जु चांदपुर पर राज करदा छा अर चांदपुर 52 गडों मा बटि एक गड़ छौ, मगर भानु प्रताप नौंनि त छै मगर कुई नौंनु नि छौ, इलै ऊंन अपणी नौंनि ब्यो वे राजा का दगड़ा मा करै दिनी जु बद्रीनाथ मन्दिर की यात्रा पर अयां छा, अर वेका बाद अपणु राज्या अर किले को नगर भि दे दिनी। अर कनक पाल अर ऊंका पंवार बंस का बनसजों न जराजरा कैरिके अपणा 52 गडों तैं अपणा सरदारों बटि आजाद करै दिनी, अर 916 बटि केले 1804 तक पूरा गढ़वाल पर राज कैरी।
राज करण बगत बीच को सासनकाल
1358 मा 37 वु राजा जैकु नौ अजय पाल छौ वेन गढ़वाल की सब छुट्टी से छुट्टी रियासत तैं भि अपणा कपजा मा कैर दिनी, अर देवलगड़ तैं अपणी राजधानि बनै दिनी, अर गढ़वाल सम्राज्या कि स्थापना कैरी, अर वेका बाद वेन श्रीनगर की जगा बदली दिनी। अर वेका बाद 1575 बटि लेके 1591 तक बलभद्र शाह गढ़वाल का पैला राजा छा जौन शाह नौ को इस्तेमाल कैरी। वेका बाद राजा महिपाल न जु 1622 का राजा बणी छा ऊन राजधानी तैं बदली के श्रीनगर कैर दिनी अर गढ़वाल का सब हिस्सों पर अपणु राज मजबूत कैर दिनी। मगर भौत जल्द याने कि 1631 मा वु ईं दिनिया तैं छोडी के चलि गैनि, अर वेका बाद ऊंकु नौनु जैकु नौ पृथ्वी शाह छौ वू राजा बणी गै, अर जै बगत वु राजा बणी वे बगत वू सात साल को छौ, इलै भौत सालों तक महिपात शाह कि घौर वलि, याने कि रानी कर्णावती न राज कैरी, अर जब वा राज करणी छै त ऊं दिनों मा ऊन हमला करण वलों को सामना कैरी अर अपणा राज्य कि देख-देख कैरी, इख तक कि ऊंन 1640 मा मुगल सिपयों का अधिकारी नजाबत खान का सिपयों का हमला तैं भि नि होण देई, अर येका बाद महिपात शाह कि घौर वलि को नौ "नकटी रानी" पोड़ी गै अर वीं को नौ इन इलै पोड़ी किलैकी वा ऊं सब लोगु कि नाक काटी देन्दी छै जु ऊं का राज्य पर हमला करदू छौ।
वेका बाद फतेहा शाह एक ख़ास राजा बणीन अर यु 1687 बटि लेके 1716 तक गढ़वाल का राजा बणी के रैनि,अर यों तैं खास कैरिके भंगानी कि लडै मा हिस्सा लेणु खुणी याद किये जान्दू च, अर पाड़ का भौत सरा राजाओं का सिपयों न एक साथ मिली के सिख गुरु गोबिंद सिंह का सिपयों बटि युद्ध कैरि। ऊंका राज का दौरान सिख गुरु अर हर राय कु सबसे बडू नौनु राम राय जु बेदखल करयु छौ वु औरंगज़ेब कि सिफारिस पर इख बस गै, अर वेका द्वारा आखिरकार देहरदुन कि स्थापना ह्वे, अर वेका बाद फतेह शाह कि 1716 मा मौत ह्वे गै, अर ऊंका नौना उपेंद्र शाह कि 1717 मा राज गद्दी मा बैठीन मगर एक साल का भितर ही ऊंकी मौत ह्वे गै।
येका बाद प्रदीप शाह गद्दी पर बैठीन अर ऊंका शासनकाल मा वे राज्य की किस्मत चमकी गै, यु सब देखि के ऊंका दुश्मन का आँखा चंकी गैनि, जन कि सहारनपुर का गवर्नर नजीब-उद-दौला, जौन 1757 मा अपणी रोहिल्ला सेना का दगड़ा हमला कैर दिनी अर देहरादून पर कब्ज़ा कैर दिनी। हालांकि, 1770 मा, गढ़वाली सेनाओं न रोहिल्लाओं तैं हरै अर दून का इलाका पर फिर से अपणु कब्ज़ा कैर दिनी।
1791 मा नेपाल साम्राज्य की गोरखा सिपयों न कुमाऊं पर हमला कैरी अर भौत सरा पहाड़ी इलाकों पर अपणु कपजा कैर दिनी, ज़्यादातर राजाओं तैं ऊन भगै दिनी अर कुछ राजाओं तैं अपणा अधीन मा कैर दिनी। अर बारह सालों तक गोरखा लोगु को कब्ज़ा रै अर जब गोरखाओं न गढ़वाल इलाका पर बारह साल तक राज करण शुरू कैरी, त वे बगत गढ़वाल का राजा ब्रिटिश इलाका मा चलि गैनि।
अर ये दौरान गोरखाओं न गढ़वाल पर कुरुर राज कैरी। ऊंको राज अन्यायपूर्ण छौ अर ऊंका द्वारा गुलामी,अत्याचार अर सभ्य प्रशासन इन्द्री व्यवस्था न गोरखा लोगु का शासकों को नौ लोगु का बिच मा भौत बदनाम कैर दिनी। अर येका द्वारा खेती कम ह्वे गै अर गाँव बन्जर ह्वे गैनि। अर गोरखा लोगु का राज का बगत, 1811 मा गढ़वाल खुणी एक रेवेन्यू सेटलमेंट किये गै। अर ऊंको बोझ इथगा जादा छौ कि सौकार लोग ऊको कर्ज चुगता नि कैर सकिन, इलै गोरखाओं न कर्ज चुकाणु खुणी अपणा परिवार का भौत सरा लोगु तैं गुलामी खुणी बेच दिनि। अर अगर कुई मनखि या वेका परिवार का लोग नीलामी होण पर एक गुलाम का तौर पर नि खरिदी जानदा छा त लोग ऊतैं इन्द्रा लोगुका हाथ मा बेची देंदा छा जु ऊंतैं हरिद्वार मा हर की पौड़ी का पास भीमगोड़ा लिजान्दा छा। इन बुले जान्दू कि गोरखाओं न हरिद्वार मा गुलाम बाज़ार मा एक बाज़ार बनै।
मण्डल
उत्तराखण्ड दुई भागों मा बट्युं च। ‘गढवाळ मण्डल’
गढ़वाळ
जैमा (देहरादून, हरिद्वार, टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पौड़ी गढ़वाळ औन्दिन)। अर हमरा यों जिलों मा भि अलग-अलग बोलियां छिन, मगर हमरा ‘श्रीनगरिया’ बोलि ज्वा की हमरि गढवळी बोलि च या सब्ब लोगु का समझ मा ऐ जान्दी।
अर ठिक उन्नि
कुमाऊँ
‘कुमाऊँ मण्डल’ जैमा (चंपावत बागेश्वर, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, नैनीताल, उधमसिहं नगर) जिला औन्दिन। अर कुमाँऊ को पुराणु नौ ‘कूर्माचल’ छौ। येका बगल मा नेपाल पस्छिम मा हिमालै परवत च अर येका मैदानी क्षैत्र मा भाभर की दुई पट्टियाँ छिन।
लड़ै को बगत
8 सितम्बर सन् 1803 ई. सन् मा गढ़वाळ मा एक भैंकर भ्युंचळु एक छौ। तब्ब भौत सरा लोगु को नास ह्वे छौ अर इख तक की श्रीनगर नगर भि पूरो नास ह्वे गै छौ। राजा का रजवाडा भि रौण लैक नि रयुं छौ, अर ये भ्युंचळा का झटका काफी दिनों तक औण रैनी, अर काफी गौं भि खतम ह्वे गै छा। ज्यां की वजै से एक खतरनाक अकाल पौड़ी गै, अर यों दिनों मा प्रद्धम्नशाह (1797-1804 ई. सन्) राजा छौ। अर अभि यू अकाल पौड़ी ही छौ, कि ऊं दिनों मा ही नेपाल की राजनीति गोरखाणी रानी का हाथों मा छै। अर कुमाऊँ गढ़वाल त 1790 ई. सन् बटि गोरखो का कबजा मा छौ। अर गढवाळ पर लडै करण को यू बगत यों तैं भौत अच्छु लगि त ऊंन फरबरी 1803 ई. सन् मा गोरखा सेना अमरसिंह थापा अर हस्तीदल चौतरिया का सेना की देख-रेख मा गढ़वाळ पर अपणी लडै छैड़ी दिनी। अर राजा प्रद्धम्नशाह तैं श्रीनग छोड़ी के भगड़ पोड़ी, मगर फिर भि राजा न अपणी हिम्मत नि हारी, अर 14 मई 1804 का दिन पर राजा प्रद्धम्नशाह देहरादून का खुड़बुड़ा नौ की जगा मा गोरखा बटि लडै का बगत ऊँका हाथों बटि मरै गै। अर इन कैरिके गोरखों न पूरा गढ़वाल मा अपणु राज कैरी। अर काफी बगत तक यों न राज कैरी, मगर कुछ और राजा ऊँका खिलाप मा छा। मगर यों का पास मा इथगा सेना नि छै कि यू लडै कैरी सैका, इलै यों न अंगरेजों बटि मदद माँगी, बदला मा पैसा देण को वादा कैरी। अर ऊंन गोरखो तैं लड़ै मा हरै के गढवाळ बटि वापिस जाण पर मजबूर कैरी दिनी। मगर जब्ब गोरखा चलि गैनी त वादा का अनुसार पैसा तैं देणे की यों हिम्मत नि ह्वे, किलैकि यों मा पैसा नि छा, इलै अंगरेजों न येका बदला मा गढ़वाळ का दूसरा हिस्सा याने की टिहरी गढ़वाळ तैं ईस्ट इंण्डिया कम्पनी तैं दे दिनी।